कविता ने मुझे आदमी बनाया लड़कपन में ही मुझे कविता में प्यार हो गया । ज्यों - ज्यों उम्र बढ़ती गयी , त्या - त्या कविता के प्रति मेरा प्यार बढ़ता ही गया- बह प्यार इतना बढ़ा कि मैं इसकी बाढ़ में बहता ही चला गया । किताब में थी - मों में लिखी कविताएँ मुझे जी - जान से ज्यादा प्यारी लगने लगीं ! अकले में उन्हें पढ़ता और मुग्ध होता - बआस - पास की दुनिया भूल जाता । मन्द - गि शब्द मुझसे बोलने लगते और में उन्हें सुनते - सुनते उनका अर्थ समझने लगता । दे बोले बोल आदमियों के बोले बालों से अधिक प्राणदंत लगटे , मेरे अन्दर पैठते चले जाते । मैं उनका हो जाता।दे मेरे हो जाते । बम इस तरह जीने में मजा आने लगा और में , हर हमेश , ऋविताओं की दृष्टि से ही जागा , औदन और समाज का रूप निरखने - परखने लगा । ऋविता की बदकनें मुझे समाज में मिलती और समाज की बढ़कनें कविता में । मेरा इन्द्रियदीड दिवाओं में आकर संवेदनशील बना । मेरे अनुवर मन में न जाने कहाँ की उर्वरता आई कि वह रूप - स्थली बन गया और पल्लवित और पुषित होकर भाव - विभोर करने लगा । उस समय तक मेरी मानसिकता विकसित होकर परिपक्व न हुई थी - न मेरा अपना मृजनधर्मी विकास हुवा था किर भी मैं कविता को ही सर्वस्व समझने लगा था । नतीजा यह दवा कि मैं धीरे - धीरे , कविता के मधुर संदी से अपने अदिमित मन को विकपिट करने लगा । कविता के द्वारा अपनी बेटटा बी जाहत करने कमाइदिदा ने ही मानवीय चेतना से मेरा साक्षात्कार कराया । दिनारी मानवीय चेतना को काव्य - देवना बनाया है जीवन जीने के लिए , काया चेतना को अत्यंत महत्वपूर्ण समझने लगा । मुझे ज्ञात हान समावि काव्य चेतना की दृष्टि ही कृतिकार को पूरा विकसित करती है और से पनी र अमन्यं बनाती है । वह वाशी जो दैनिक जीवन के प्रांगों में प्रयुक्त होती है ,




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