वक्रोक्ति-सिद्धान्त और छायावाद विजेन्द्र नारायण सिंह | Vakrokti Siddhaant Aur Chhaayaavaad By Vijendr Narayan Singh


 

वक्रोक्ति सिद्धान्त और छायावाद
प्रबंध की प्रतिज्ञा तो सम्पूर्ण प्रबन्ध में ही उपम्यस्त है। किसी भी काव्य-विद्वाना की बोत्र काव्यालोचन के सन्तोषप्रद प्रतिमान की खोज होती है। नयी समीक्षा ने यह बात लगभग मान ली है कि काव्य-भाषा के प्रतिमान से अधिक तटस्थ झालोचना का दूसरा प्रतिमाम कदाचित् संभव नहीं है। अनुभूतियाँ कवि की होती है किन्तु वह इन्हें भाषा के द्वारा सुरक्षित रखता है। भाषा धनुभूतियों को सुरक्षित रखने का प्राधान-पात्र है। इस कारण कविता का निम विश्लेषण भाषा का ही विश्लेषण सिद्ध होता है। कॉलरिज ने जब कविता को शब्दों का उत्कृष्ट हम कम बतलाया था, तब वह काव्य में भाषा प्रयोग की इसी केन्द्रीय स्थिति की और इशारा कर रहा थो। कविता सबसे अच्छी भाषा है। इसी को कुन्तक ने 'बक्रोक्ति' कहा है। आलोचक के हाथ में को बोजार होता है, वह है विश्लेषण का। रसानुभूति धास्वाय होती है किन्तु उसका विश्लेषता बाश्य नहीं है। रस-सिद्धान्त की सीमाओं को इसी सन्दर्भ में रेखांकित किया जा सकता है। धात्स्याय में हमारी संश्लेष की वृत्ति सजग रहती है और मूल्यांकन में विश्लेष की। अतएव मूल्यांकन की घोर उम्मुख होने वाले व्यक्ति को धास्वादेतर तत्त्वों को अधिक महत्व देना होगा। रसवाद धारवाद की एक प्रक्रिया है। उसे मूल्यांकन का पूर्ण प्रतिमान नहीं बनाया जा सकता । इस कोण से देखने पर वक्रोक्ति-सिद्धान्त रस-सिद्धान्त की अपेक्षा अधिक मंगत समीक्षा-सिद्धान्त प्रमाणित होता है।
प्रतिज्ञा की दिशा का परिप्रेक्ष्य सामयिक है। आज के गद्य की भाषा प्रयोजन की भाषा है। यह बहुत कुच्छ गणितीय प्रतीक की तरह व्यवहृत होने लगी है और उसकी रागात्मक शक्ति कीगा हो गयी है। भाषागत पद पदार्थ के बोधक होते हैं और वे भाषातीत अर्थ नहीं दे पाते। गड-कल्प से परे भाषातीत अर्थ देने की संभावनाएँ असीम हैं। इसलिये वक्रोक्ति की आवश्यकता आज भी उतनी ही है। काव्य-भाषा के अनन्य साधारण स्वरूप को उभारने वाली चीज है वक्रोक्ति। ग्रामप्रहम भाषा का ही परिष्कार वक्रोक्ति-सिद्धान्त की आधार शिला है। वक्रोक्ति बाषा की विकसित पुनगी है एवं धामफ़हम भाषा की प्रकृति और उसकी प्राणवत्ता भी इस विकसनशील फुलगी को ऊपर उठने को प्रेरित करती है। वक्रोक्ति परिष्कार है, लेकिन इस परिष्कार की बच्चि बोलचाल की भाषा में ही प्रसुत है। 'वक्रोक्तिभीवितम्' में पंडिताऊ भाषा की मीमांसा नहीं थकी गयी है वरन् आमफहम भाषा को नवीन स्तर पर पहुँचाने की काव्यात्मक क्षमता का ही पंचाय मिलता है।
प्रवन्ध को सुनियोजित रूप देने के लिए उसे स्पष्टतः दो सच्चों में विभाजित कर दिया गया है।म में वक्रोक्ति-सिद्धान्त का इतिहास, विवेचन-विश्लेषण और पुनरीक्षण किया गया है। यह सच्-वस्तुतः बचोलित-सिद्धान्त का पुनराख्यान ही है। शुरू-शुरू में ही पुढे देख -सिद्धान्त के कई तत्व नयी समीक्षा के अनुकूल पड़ते है घोर बाद के अनुशीलन से मेरे इस मत की निन्ति पुष्टि हुई। नयी समीक्षा की सिद्धि शाचीन कड़ियों का परित्याग करे एवं परम्परा से महिलांच भी करे।......................

Vakrokti Siddhaant Aur Chhaayaavaad By Vijendr Narayan Singh

Published Book 1971

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